कारसेवको पर गोली किसने चलवाई | क्या मुलायम सिंह यादव को बदनाम करने की शाजिश थी |

 कारसेवको पर गोली किसने चलवाई | क्या मुलायम सिंह यादव को बदनाम करने की शाजिश थी | 



सत्ता का लालच इस कदर अपना जमीर बेच चूका है की सत्ता पाने के लिए लोग, किसी भी अस्त्तर तक जा सकते हैं
उत्तर प्रदेश ,रानीतिक सत्ता की सबसे बड़ी जन्मभूमि है ,समय समय पर यूपी की सत्ता कई विचारधाराओं के हाथ में जाती  रही है 
आज हम आप को एक सबसे बड़े इतिहासिक झूठ की साजिश के बारे में बतायेंगे 

अयोध्या गोली कांड 1990 की पुरी सच्चाई

5 दिसम्बर 1989 मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्य्मंत्री बने  :- 

साल 1989 ,उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावो का परिणाम घोषित हो चूका था ,जनता दल 204  विधायको के साथ प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी थी .

यूपी में जनता दल को अपनी सरकार बनाने के लिए बहार से बीजेपी का भी समर्थन था और यही स्थिति केन्द्र में वीपी सिंह की सरकार की भी थी .

जनता दल + कांग्रेस + बीजेपी + निर्दली विधायक 


कारसेवको पर गोली किसने चलवाई | क्या मुलायम सिंह यादव को बदनाम करने की शाजिश थी |



जनता दल के शीर्ष नेतृत्व ने मुलायम सिंह यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया , उत्तर प्रदेश में पहली बार एक पिछड़े समाज का नेता मुख्यमंत्री बना था 

उधर केंद्र में भी जनता दल की सरकार बीजेपी और कुछ सहयोगी पार्टियों के सहयोग से चल रही थी ,वी पी सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन के सिफारिशो के आधार पर पिछड़े समाज के लोगो को रिजर्वेशन देने के लिए मंडल कमीशन लागू कर दिया था ,उसी तरह से उत्तर प्रदेश में मुलयम सिंह यादव ने भी 27 % रिजर्वेशन उत्तर प्रदेश में भी लागू कर दिया था 

इसी बीच साल 1990 में BJP और RSS ने राम मंदिर निर्माण और बाबरी मस्जित तोड़ने के लिए कारसेवको को पुरे भारत से अयोध्या आने के लिए आह्वान किया 

वही दूसरी तरफ वर्तमान सरकार कोर्ट के आदेश का पालन करने के लिए शक्त नियम लागू कर दिया था ,

23 अक्टूबर 1990 को  BJP के कद्दावर नेता लाल कृष्ण आडवानी अपने रथ यात्रा के दौरान बिहार के समस्तीपुर में बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के द्वारा गिरफ्तार कर लिया गए थे 

इस गिरफ्तारी के कें बाद बीजेपी ने वी पी सिंह और मुलायम सिंह से अपना समर्थन वापस ले लिया 

वही अयोध्या में कारसेवको पहुंचने की कोशिशों को देखते हुए प्रशासन ने भारी सुरक्षा व्यवस्था की।

अयोध्या में बैरिकेडिंग, पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती बढ़ाई गई।

30 अक्टूबर 1990 का गोलीकांड 

BJP और RSS के आहवान के बाद हजारो की संख्या में कार सेवक विवादित स्थल तक पहुचने लगे थे , उन्हें रोकने के लिए सुरक्षा बलो ने फायरिंग शुरू कर दिया ,जिसमे कई कारसेवक मारे गए 

मारे गए कार सेवको की संख्या कितनी थी इसका आज तक कोई अधिकारिक सही रिकॉर्ड नहीं मिला ,इसके बाद अयोध्या में कर्फ्यू लगा दिया गया था 

इस गोली कांड के बाद मुलायम सिंह पर राजनीतिक हमले हुए जिसमे मुलायम सिंह को गोलीकांड का मुख्यारोपी बनाया गया 

कुछ सामंतवादी विचार धरा के लोगो ने मुलायम सिंह को हिन्दू विरोधी और मुस्लिम समर्थक बताया ,लेकिन ये गोलीकांड एक बहुत बड़े शाजिश का हिस्सा था ,जिसकी चर्चा मै आगे करूँगा 

इस पुरे गोली कांड को अंजाम देने वाले फ़ैजाबाद के तात्कालिक डीएम राम शरण श्रीवास्तव और प्रमुख सचिव वरिष्ठ IAS अधिकारी नृपेंद्र मिश्र थे और उस समय वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) के पद पर सुभाष जोशी तैनात थे ,सबसे पहले नृपेंद्र मिश्र के बारे में जान लेते हैं

कौन है नृपेंद्र मिश्र :-

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उत्तर प्रदेश प्रशासनिक अधिकारी एवम वरिष्ट IAS , नृपेंद्र मिश्र ,1990 में मुलायम सिंह यादव के प्रधान सचिव थे , बाद में नरेंद्र मोदी के दोनों शासनकाल (2014 और 2019)  में प्रधान सचिव बने 

9 नवंबर 2019 रामजन्मभूमि पर कोर्ट के फैसले  के बाद उन्हें रामजन्म भूमि ट्रस्ट में निर्माण समिति का अध्यक्ष बना दिया गया ,सोचिये जिस राम जन्म भूमि पर उन्होंने कारसेवको पर गोली चलवाई उसी मंदिर के निर्माण समिति का अध्यक्ष बना दिया गया 

कौन है DM राम शरण श्रीवास्तव :- 

हमीरपुर जिले के रहने वाले राम शरण श्रीवास्तव 1987 से 1990 तक फैजाबाद जिले के डीएम थे ,कार सेवको पर गोली चलवाने में इनकी भी भूमिका थी और इसी आरोप में इनके ऊपर सीबीआई ने आरोपी बनाया था लेकिन सत्ता बदलते ही 2020 में सीबीआई की विशेष अदालत ने उन्हें बरी कर दिया 
इन्होने ने खुद के बचाव में  दो कितावे लिखी 'एक दृष्टिकोण: राम जन्मभूमि और  बाबरी मस्जिद विवाद' और खुद ही अपने आप को निर्दोषों साबित कर लिया 

कौन है वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) के पद पर सुभाष जोशी :-

सुभाष जोशी 1976 बैच के IPS अधिकारी हैं और उत्तर प्रदेश कैडर से सेवा शुरू करने के बाद उत्तराखंड कैडर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बने। फरवरी 1982 से जून 1984 तक वे SP (City), Lucknow रहे।
1990 के 30 अक्टूबर/2 नवंबर के गोलीकांड के समय सुभाष जोशी फैजाबाद के SSP थे

गोलीकांड में नृपेंद्र मिश्र की भूमिका 

जनवरी 2024 में Jist के कार्यक्रम “Hotspot with Nripendra Misra” में उनसे अयोध्या गोलीकांड के बारे में सवाल किया गया।

“Mulayam Singh Didn't Order Firing On Kar Sevaks In Ayodhya”

फायरिंग का आदेश मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत/CM Office स्तर से जारी नहीं हुआ था और इस प्रकार के कानून-व्यवस्था संबंधी फैसले प्रशासनिक स्तर पर लिए जाते थे।

नृपेंद्र मिश्र का दावा है कि गोली चलाने का प्रत्यक्ष आदेश मुख्यमंत्री कार्यालय से नहीं आया था, बल्कि कानून-व्यवस्था की स्थिति में स्थानीय प्रशासन ने कार्रवाई की।

स्थानीय प्रशासन मतलब डीएम,SP,और मुख्यसचिव होते है इसका ,मतलब इस पुरे घटना में सीधे तौर पर मुलायम सिंह जिम्मेदार नहीं थे ,लेकिन कुछ पार्टिया और चाटुकार मीडिया के लोगो ने सिर्फ और सिर्फ मुलायम सिंह को बदनाम किये  

जब की जस्टिस स्वरूप आयोग  के रिपोर्ट में भी पुलिस की गलती का जिक्र किया गया है 

जस्टिस स्वरूप आयोग (Justice Swaroop Commission) का गठन

वर्ष 1990 के अयोध्या कारसेवक गोलीकांड की जांच के लिए तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जस्टिस स्वरूप आयोग (Justice Swaroop Commission) का गठन किया गया था। इस आयोग की कमान इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस आर.एम.स्वरूप (Justice R.M. Swaroop) को सौंपी गई थी।

आयोग का रिपोर्ट 

कारसेवको पर गोली किसने चलवाई | क्या मुलायम सिंह यादव को बदनाम करने की शाजिश थी |


  • कुछ स्थानों पर भीड़ को तितर-बितर करने के लिए तय मानक प्रक्रियाओं (जैसे- पहले लाठीचार्ज, पानी की बौछारें, फिर आंसू गैस और हवाई फायरिंग) का पूरी तरह पालन किए बिना सीधे बल प्रयोग करने पर सवाल उठाए गए।
  • तत्कालीन जिला प्रशासन (DM और पुलिस) तथा लखनऊ (मुख्यालय) के बीच संदेशों और आदेशों के आदान-प्रदान में कुछ स्पष्टता की कमी थी, जिसके कारण ग्राउंड पर तैनात सुरक्षा बलों ने अत्यधिक आक्रामक रुख अपनाया।
  • ग्राउंड पर सुरक्षा बलों ने कुछ जगहों पर भीड़ को नियंत्रित करने वाली मानक प्रक्रिया (जैसे पहले लाठीचार्ज, पानी की बौछार या आंसू गैस छोड़ना) का पूरी तरह से पालन किए बिना सीधे अत्यधिक बल (फायरिंग) का सहारा लिया था।
  • आयोग ने सरकार द्वारा दी गई आधिकारिक मृतक संख्या (जो लगभग 15-16 बताई गई थी) और हिंदू संगठनों के दावों (जो सैकड़ों में होने की बात कह रहे थे) के बीच साक्ष्यों की जांच की। आयोग को संगठन के दावों के अनुसार सामूहिक मौतों के पुख्ता ऑन-रिकॉर्ड साक्ष्य नहीं मिले,
  • आयोग ने अपने निष्कर्षों में यह माना कि उस दौरान लखनऊ मुख्यालय (शासन) और अयोध्या/फैजाबाद के स्थानीय जिला प्रशासन (DM व पुलिस अधिकारियों) के बीच संदेशों और रणनीति के स्तर पर उचित समन्वय की कमी थी।
  • अर्थात CM के आदेशो को नजरंदाज किया गया और लोकल प्रशासन अपनी मर्जी से गोली चलवाया 

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